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126) गद्यांश:
स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह नहीं है कि शासक वर्ग ने औद्योगिकीकरण का मार्ग चुना, ट्रेजेडी यह रही है कि पश्चिम की देखादेखी और नकल में योजनाएँ बनाते समय – प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाजुक संतुलन किस तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है – इस ओर हमारे पश्चिम शिक्षित सत्ताधारियों का ध्यान कभी नहीं गया। हम बिना पश्चिम को मॉडल बनाए, अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर, औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धारित कर सकते हैं, कभी इसका ख्याल भी हमारे शासकों को आया हो, ऐसा नहीं जान पड़ता। स्वतंत्रता के बाद भारत की त्रासदी है __________
A) पश्चिमी देशों का अंधानुकरण
B) भारतीय मॉडल
C) औद्योगिकीकरण
D) पंचवर्षीय योजनाएँ
127) गद्यांश में किसके संतुलन की बात की गई है?
A) प्रकृति, मानव और उद्योग
B) प्रकृति, मानव और मानवता
C) प्रकृति, मानवता और विकास
D) प्रकृति, मानव और संस्कृति
128) “संतुलन” का विलोम शब्द है —
A) आसंतुलन
B) असंतुलित
C) असंतुुलित
D) असंतुलन
129) गद्यांश:
इस ब्रह्मांड में हम सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे से ज़्यादा खास नहीं है क्योंकि परमात्मा की नज़र में हम सब एक समान हैं। ध्यान-अभ्यास हमें सभी जीवों को एक समान देखने में मदद करता है। हम मानते हैं कि कोई भी व्यक्ति जो एक चौकीदार, क्लर्क या कैशियर है, वह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि किसी कंपनी का कोई मालिक। हमें समझ आता है कि किसी कंपनी का मालिक कर्मचारियों के बिना काम नहीं कर सकता। चाहे वे अधिक वेतन पाने वाले हों या सबसे कम वेतन वाले। सभी लोग अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। भले ही हम बाहर से रंग, रूप, समाज, संस्कृति आदि के स्तर पर अलग दिखते हैं लेकिन पिता-परमेश्वर की संतान होने के नाते हम सभी एक समान हैं।
गद्यांश के अनुसार सभी व्यक्ति
A) समान वेतन के अधिकारी हैं।
B) व्यवसाय में लगे हुए हैं।
C) एक समान हैं।
D) महत्वपूर्ण हैं।
130) गद्यांश के आधार पर कहा जा सकता है कि हम सभी समान हैं क्योंकि
A) हम ईश्वर की संतान हैं।
B) हम कंपनी के कर्मचारी हैं।
C) हमारी जीवन-शैली समान है।
D) हमारा जीवन-लक्ष्य समान है।